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अध्याय २१ — रक्षक देवों की आतिथ्य और लिंग-जी बोधिसत्त्व की वायु-विजय

पीत-पवन राक्षस की आँधी से परास्त होकर सुन वुकोंग लघु-सुमेरु पर्वत पर लिंग-जी बोधिसत्त्व की शरण में जाता है, जो अपने उड़न-नाग दंड से राक्षस को पकड़ लेते हैं।

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पचास पराजित छोटे राक्षस टूटे हुए ध्वज और फटे हुए नगाड़े लेकर गुफा में भागे। उन्होंने पुकारा — महाराज, बाघ-सेनापति उस बालों वाले भिक्षु से हार गया और पूर्वी पहाड़ी की ओर खदेड़ दिया गया।

वृद्ध राक्षस ने यह सुना तो उसका मुख क्रोध से काला पड़ गया। वह सोच ही रहा था कि सामने के द्वार के पहरेदार ने दौड़ते हुए खबर दी — महाराज, वह बालों वाला भिक्षु बाघ-सेनापति को मारकर दरवाजे के सामने खड़ा युद्ध के लिए ललकार रहा है।

राक्षस ने बड़बड़ाया — इस बंदर ने मेरे गुरु को नहीं खाया, फिर भी मेरे सेनापति को मार दिया। घृणित! घृणित! उसने शस्त्र-कवच मँगवाए। सोने का शिरस्त्राण और सुनहरा कवच धारण कर, त्रिशूल-भाले को थामकर वह अपनी सेना के साथ गुफा से बाहर निकला।

महासंत ने उसे देखा — देखो कैसे था वह वीर! सोने का मुकुट सूरज की रोशनी में चमक रहा था, कवच पर प्रकाश की लकीरें थीं, ऊपर मोर-पंखों की कलगी थी, हाथ में तीन नोक वाला तेज भाला था।

राक्षस ने गरजते हुए पूछा — वह सुन वुकोंग कहाँ है?

सुन वुकोंग ने उत्तर दिया — तुम्हारा पितामह यहाँ है! मेरे गुरु को छोड़ दो।

राक्षस ने उसे देखकर ठहाका मारा — अरे, यह तो बस एक ठिगना बीमार बंदर है! मैंने सोचा था कोई पहाड़ जैसा योद्धा होगा।

— तेरा बेटा नजर नहीं है! — वुकोंग बोला — तुम्हारा पितामह छोटा जरूर है, पर अगर तुम डंडे की पीठ से एक मार लगाओ तो छह हाथ ऊँचा हो जाए!

राक्षस ने वाकई एक वार किया। वुकोंग ने कमर झुकाई, शरीर लंबा हो गया — एक दस हाथ का महाविशाल आकृति! राक्षस घबराया, लेकिन रुका नहीं।

दोनों पीत-पवन गुफा के द्वार पर भिड़ गए — एक सुंदर संग्राम!

भाले और दंड आपस में टकराए। एक था पर्वत का सेनापति, दूसरा था धर्म-रक्षक सुंदर वानर-राजा। पहले तो धरती पर लड़ते रहे, फिर आकाश में उठ गए। त्रिशूल तेज था, इच्छानुसार स्वर्णदंड चमकदार था। जिसे भाला लगे उसकी आत्मा यमराज के पास और जिसे दंड लगे उसका अंत।

तीस दौर तक दोनों बराबरी पर रहे।

तब वुकोंग ने एक चाल चली — बालों का एक मुट्ठी भर निकाला, चबाया, फूँका और बोला — बदलो! सैकड़ों नकली वुकोंग प्रकट हो गए, सब दंड लेकर राक्षस को घेरने लगे।

राक्षस ने भी अपनी शक्ति का उपयोग किया — उसने दक्षिण-पूर्व की दिशा में मुँह करके तीन बार मुँह खोला और एक विशाल पीली आँधी आई।

वह आँधी — सुनो कैसी थी!

ठंडी घूर्णित हवा से आकाश-पृथ्वी बदले, बिना रूप बिना छाया रेत घूमे। वन उखड़े, पर्वत झुके, देवदारु गिरे, मिट्टी उड़ी, धूल उठी, पहाड़ियाँ हिलीं। पीली नदी की लहरें तह तक मैली हुईं, जल उछला, बवंडर आया। नीला आकाश थरथराया, आकाशगंगा हिली, यमराज का दरबार लड़खड़ाने लगा। पाँच सौ अर्हत आकाश में चिल्लाए, आठ महा-वज्र एक साथ घबराए। पीली माँ का शेर कहीं खो गया, श्वेत हाथी उसे ढूँढता भटक गया। सूर्य की रोशनी बुझ गई, तारों का आसन हिल गया। आड़ू-उद्यान की दीवारें झुकीं, स्वर्ग-महल की तीन मंजिलें झुकने लगीं। जेड सम्राट के दरबार में अफरा-तफरी थी, सारी सृष्टि थरथराने लगी।

उत्तर के पक्षी दक्षिण को भागे, पूर्व के जल पश्चिम को बहे। नर-मादा अलग हो गए, माँ-बच्चे बिछड़ गए। यह पवन ब्रह्मांड की सृष्टि से आज तक इतनी भयंकर कभी नहीं आई थी।

आँधी ने वुकोंग के बालों से बने नकली वुकोंगों को हवा में चरखी की तरह घुमा दिया। उसने उन्हें वापस बुला लिया। फिर अकेले दंड लेकर आगे बढ़ा, लेकिन राक्षस ने फिर एक मुट्ठी पीली हवा उसके मुँह पर फेंकी — आग जैसी आँखें बंद हो गईं, आँसू बहने लगे। वुकोंग को पीछे हटना पड़ा।

झू बाजिए पहाड़ की दरार में छिपा था — आँखें मींचे, माथा झुकाए। जब आँधी थमी, वुकोंग आया।

— दादा, कैसा गजब तूफान था! — झू बोला।

— हाँ, — वुकोंग ने कहा — उस बुढ्ढे राक्षस का त्रिशूल ठीक-ठाक है, हमने तीस दौर लड़े। मैंने शरीर-बाहर चाल चली, लेकिन उसने यह पवन चलाई। भयंकर आँधी — मैं खड़ा भी न रह सका।

— तो गुरु जी को कैसे बचाएँगे? — झू बाजिए ने पूछा।

— पहले किसी नेत्र-वैद्य को ढूँढ — मेरी आँखें जल रही हैं, आँसू रुक नहीं रहे।

झू बाजिए ने चारों ओर देखा — रात हो रही थी। अचानक पहाड़ी के दक्षिण में एक घर की रोशनी दिखी। दोनों वहाँ गए। एक बूढ़े किसान ने दरवाजा खोला।

सुन वुकोंग ने सारी बात कही — हम पश्चिम की यात्रा पर हैं, हमारे गुरु पीत-पवन राक्षस के कैद में हैं। एक रात की शरण चाहिए।

बूढ़े ने सहर्ष स्वागत किया। रात को खाना मिला। बूढ़े ने कहा कि उसके पास एक नेत्र औषधि है — त्रि-पुष्प नव-बीज मलहम। उसने वुकोंग की आँखों में लगाई।

रात को वुकोंग ने अपनी आंतरिक शक्ति से उपचार किया और सो गया।

भोर होते ही वुकोंग ने आँखें मलीं — पहले से सौ गुना रोशनी! उसने पलटकर देखा — कहाँ मकान, कहाँ दीवार! वे सब पुराने बरगद के पेड़ों के नीचे हरी घास पर सोए थे।

झू बाजिए बोला — यह घर वाले चुपचाप चले गए? रात में घर तोड़कर? मैंने आवाज तक नहीं सुनी।

वुकोंग हँसा — उस पेड़ पर एक कागज देखो।

झू बाजिए ने उतारा — चार पंक्तियाँ लिखी थीं: "यह घर सामान्य मनुष्यों का नहीं, धर्म-रक्षक देवों का वरदान था। औषधि से तुम्हारी आँखें ठीक कीं, अब बिना देर राक्षस को जीतो।"

वुकोंग बोला — ये छह दिशाओं के देव, चार काल-कर्मी, पाँच दिशाओं के दूत और अठारह धर्म-रक्षक — ये सब गुआनयिन बोधिसत्त्व के आदेश से गुरु की रक्षा करते हैं। ये हमारी सेवा में हैं।

— दादा, पर अब गुरु को कैसे बचाएँ? — झू बाजिए ने पूछा।

— मैं पहले गुफा में घुसकर गुरु का हाल देखता हूँ। तुम यहाँ घोड़े और सामान की रक्षा करो।

वुकोंग एक मच्छर में बदल गया — छोटा, तेज, अदृश्य। वह गुफा के अंदर घुस गया।

पीछे के बाड़े में, एक खम्भे से बँधे, आँसू बहाते — तांग सान्ज़ांग! गुरु सुन वुकोंग और झू बाजिए को याद करके रो रहे थे।

वुकोंग गुरु के सिर पर बैठकर फुसफुसाया — गुरु जी!

— वुकोंग? — गुरु ने पहचाना — तुम कहाँ हो?

— आपके सिर पर हूँ गुरु जी। घबराइए नहीं। आज ही उस राक्षस को पकड़ेंगे।

तब वुकोंग आगे के दरबार में गया। छत के शहतीर पर बैठकर उसने सुना — राक्षस अपनी सेना को निर्देश दे रहा था।

एक छोटा राक्षस दौड़ता आया — महाराज, उस लंबी थूथन वाले भिक्षु को जंगल में बैठे देखा!

राक्षस बड़बड़ाया — सुन वुकोंग शायद आँधी से मर गया, या कहीं सहायता माँगने गया है। कोई क्या बिगाड़ लेगा? सिवाय लिंग-जी बोधिसत्त्व के कोई मेरी हवा को रोक नहीं सकता।

बस यह एक वाक्य — वुकोंग के लिए यही काफी था। वह उड़ा, झू बाजिए के पास आया।

— भाई, गुरु जी ठीक हैं, लेकिन उन्हें बँधा हुआ पाया। और मुझे एक सुराग मिला — राक्षस ने खुद बताया कि केवल लिंग-जी बोधिसत्त्व उसकी हवा को रोक सकते हैं।

— लिंग-जी कहाँ हैं? — झू बोला।

अचानक राह में एक वृद्ध आगंतुक प्रकट हुए — बर्फ जैसी दाढ़ी, उज्ज्वल आँखें, हाथ में एक छड़ी। वुकोंग ने पूछा — बाबा, लिंग-जी बोधिसत्त्व कहाँ रहते हैं?

बूढ़े ने दक्षिण की ओर इशारा किया — तीन हजार योजन दूर, लघु-सुमेरु पर्वत पर।

और वह बूढ़ा स्वच्छ वायु में विलीन हो गया। उनके पीछे एक पत्रिका रह गई: "स्वर्ग-तुल्य महासंत को सूचित करें — यह वृद्ध ली चांग-गेंग थे। सुमेरु पर उड़न-नाग दंड है — लिंग-जी को बुद्ध ने यह शस्त्र दिया था।"

— ली चांग-गेंग कौन हैं? — झू बाजिए ने पूछा।

— पश्चिम के सुनहरे-तारा देव।

झू बाजिए तुरंत आकाश की ओर झुककर बोला — देव, आपने मुझे जेड सम्राट के दरबार में बचाया था! आपका उपकार नहीं भूलूँगा!

वुकोंग ने कहा — जंगल में रहो, घोड़े की देखभाल करो। मैं लिंग-जी बोधिसत्त्व को लेने जाता हूँ।

पलटी-बादल पर सवार होकर वुकोंग दक्षिण की ओर उड़ा। तीन हजार योजन — बस चंद क्षणों में! लघु-सुमेरु पर्वत पर शुभ बादल, मंगल प्रकाश।

पर्वत के कंदरे में एक ध्यान मंदिर था। घंटियाँ बज रही थीं, धूप की महक थी।

एक शिष्य ने वुकोंग को देखा — आप कौन हैं स्वामी?

— मैं तांग सान्ज़ांग का शिष्य सुन वुकोंग हूँ। बोधिसत्त्व से मिलना है।

शिष्य ने भीतर सूचना दी। लिंग-जी बोधिसत्त्व स्वयं बाहर आए — काषाय वस्त्र, शांत मुखमंडल।

वुकोंग को बिठाया, चाय आई। वुकोंग बोला — चाय नहीं चाहिए। मेरे गुरु पीत-पवन पर्वत पर संकट में हैं। आप कृपया अपनी महाशक्ति से राक्षस को पकड़ें।

बोधिसत्त्व ने गंभीरता से कहा — मुझे तथागत बुद्ध का आदेश था — पीत-पवन राक्षस पर नजर रखूँ। मैंने उसे एक बार पकड़ा था, जान बख्शी और पहाड़ में वापस भेजा। यह जानकर दुख है कि उसने तुम्हारे गुरु को हानि पहुँचाई। मेरा दोष है। चलो।

बोधिसत्त्व ने उड़न-नाग दंड उठाया और दोनों बादल पर उड़े।

पीत-पवन पर्वत — बोधिसत्त्व बादलों में रुके और वुकोंग से बोले — तुम नीचे जाकर उसे युद्ध के लिए ललकारो, उसे बाहर खींचो।

वुकोंग नीचे आया, दरवाजा तोड़ा और चिल्लाया — राक्षस, मेरे गुरु को छोड़!

राक्षस फिर बाहर आया, त्रिशूल लेकर। दोनों भिड़े। कुछ दौर के बाद राक्षस ने हवा चलाने के लिए मुँह खोला —

ऊपर से लिंग-जी बोधिसत्त्व ने उड़न-नाग दंड फेंका। मंत्र पढ़े। वह दंड आठ पंजों वाले सोने के अजगर में बदल गया, जिसने राक्षस को झपटकर पकड़ लिया और चट्टान पर पटका।

असली रूप प्रकट हुआ — एक पीले रोम वाला चुहा!

वुकोंग दंड उठाने दौड़ा, लेकिन बोधिसत्त्व ने रोका — इसे मत मारो। इसे तथागत के सामने ले जाना है। यह प्रभासगिरि के पास का प्राचीन चूहा है — स्फटिक दीपक का तेल चुराया था, डर से भाग आया था। तथागत ने देखा था कि इसे मृत्यु-दंड नहीं होना चाहिए, इसीलिए मुझे इसे नियंत्रण में रखने का काम दिया था। अब इसने गलती की है, इसे बुद्ध के सामने पेश करूँगा।

वुकोंग ने आभार व्यक्त किया। बोधिसत्त्व पश्चिम को उड़ गए।

वुकोंग जंगल में झू बाजिए के पास लौटा — चलो, गुफा में जाकर गुरु को बचाएँ!

दोनों गुफा में घुसे, उस राक्षस-परिवार को दंड और हल से खत्म किया। पीछे बाड़े में गए — गुरु बँधे थे।

तांग सान्ज़ांग बाहर आए और बोले — तुम दोनों ने राक्षस को कैसे पकड़ा?

वुकोंग ने सारी कहानी बताई। गुरु का आभार असीमित था।

तीनों ने गुफा में जो भी शाकाहारी भोजन था, खाया। फिर पश्चिम की राह पकड़ी।