अध्याय २: बोध की गहराई — राक्षस-वध और घर-वापसी
सुन वुकोंग सुबोधि गुरु से बहत्तर रूपांतरण और पलटी-बादल विद्या सीखता है, फिर घर लौटकर राक्षस का वध करता है
सुन वुकोंग को नाम मिला। वो खुशी से उछल पड़ा, गुरु को प्रणाम किया।
सुबोधि गुरु ने उसे दूसरे शिष्यों के साथ भेज दिया — सीखो कैसे बात करें, कैसे व्यवहार करें।
वुकोंग रोज़ उठता, झाड़ू लगाता, बगीचे में काम करता, लकड़ी लाता, पानी भरता। हर दिन यही। छह-सात साल बिना शिकायत के।
एक दिन गुरुदेव मंच पर बैठे और महाज्ञान सुनाने लगे। शिष्य मंत्रमुग्ध थे।
आकाश से दिव्य फूल बरस रहे थे, धरती से सोने के कमल उग रहे थे। तीन वाहनों का रहस्य खुल रहा था, दस हज़ार नियमों का सार बह रहा था।
वुकोंग सुन रहा था — और अचानक खड़ा होकर नाचने लगा।
गुरु ने देखा।
— वुकोंग! तुम नाच क्यों रहे हो?
— गुरुदेव! आपकी वाणी इतनी अद्भुत है — मैं अपनी खुशी रोक नहीं पाया!
गुरु ने पूछा: — तुम यहाँ कितने वर्षों से हो?
— मुझे नहीं पता। बस याद है — पिछली बार जब मैं पहाड़ के पीछे लकड़ी लाने गया था, तो वहाँ एक सुंदर आड़ू का पेड़ था। मैंने सात बार भरपेट खाया।
— यानी सात साल। — गुरु बोले। — अच्छा। तुम क्या सीखना चाहते हो?
— जो गुरुदेव सिखाएं।
गुरु ने कई विद्याएं बताईं — भूत बुलाने की, ज्योतिष की, योग की, शरीर-संयम की। हर बार वुकोंग ने पूछा: — क्या इससे अमरत्व मिलेगा?
हर बार उत्तर था: — नहीं।
— तो नहीं सीखूंगा।
अंत में गुरु उठे, वुकोंग के सिर पर तीन बार छड़ी मारी, और हाथ पीछे बाँधकर चले गए — दरवाज़ा बंद।
सब शिष्य वुकोंग पर बिगड़े:
— तुमने गुरु को नाराज़ किया!
लेकिन वुकोंग मुस्कुराता रहा।
कारण था — उसने संकेत समझ लिया था। तीन बार मारा था — यानी तीसरे पहर। दरवाज़ा बंद किया — यानी पिछले दरवाज़े से आओ।
रात के तीसरे पहर वुकोंग चुपचाप उठा। तारे देखे:
स्वच्छ चाँदनी, ठंडी ओस, आठों दिशाओं में धूल नहीं। घने पेड़ों में अदृश्य पक्षी सोते, स्रोत का जल बहता, शांत। जुगनू की रोशनी बिखरती, प्रवासी हंस बादलों में उड़ते। यही है मध्यरात्रि — साधना का सच्चा समय।
वो पिछले दरवाज़े गया। आधा खुला था।
भीतर गया। गुरु सो रहे थे।
वुकोंग घुटनों पर बैठ गया — बिस्तर के सामने।
कुछ देर बाद गुरु जागे। वुकोंग देखकर बोले:
— अरे! तुम यहाँ क्यों हो?
— गुरुदेव, आपने ही संकेत दिया था — तीसरे पहर, पिछले दरवाज़े से।
गुरु मन ही मन प्रसन्न हुए। यह वानर सचमुच असाधारण है।
— तुम्हारे अलावा कोई नहीं है?
— केवल मैं।
— तो सुनो।
और गुरु ने धीरे-धीरे कानों में कहा — अमरत्व का रहस्य:
स्पष्ट और गुप्त, दोनों मिलकर अद्भुत बनते हैं, जीवन-साधना का कोई और मार्ग नहीं। सब कुछ है — प्राण, वायु, और आत्मा, सावधानी से रखो इन्हें, बाहर मत जाने दो। भीतर छुपाओ, शरीर में बसाओ, यही ग्रहण करो — मार्ग स्वयं आएगा। मुँह का सूत्र बहुत काम का है, बुरी इच्छाओं को हटाओ, शीतलता पाओ। शीतलता पाओ, ज्ञान चमकेगा, फिर चंद्रमा को देखो — सुनहरा और शुद्ध। चंद्रमा में खरगोश, सूर्य में कौआ, कछुआ और साँप एक-दूसरे में लिपटे हैं। लिपटे रहे तो जीवन दृढ़ होगा, आग में भी कमल खिलेगा। पाँच तत्वों को उलटा इस्तेमाल करो, काम पूरा हुआ — बुद्ध या देवता बन जाओगे।
वुकोंग ने शब्द-शब्द कंठस्थ किया।
तीन और वर्ष बीत गए।
एक दिन गुरु ने फिर पूछा: — वुकोंग, तुम्हारी विद्या कहाँ तक पहुँची?
— गुरुदेव, मैंने अपनी प्रकृति को पहचाना। जड़ें मज़बूत हो गई हैं।
— लेकिन एक खतरा है। — गुरु बोले। — जब तुम यह उच्च साधना करोगे, तो पाँच सौ साल बाद आकाश से बिजली गिरेगी। एक हज़ार साल बाद आग आएगी — भीतर से। डेढ़ हज़ार साल बाद भयंकर हवा आएगी। अगर बच गए — आकाश जितनी आयु।
वुकोंग घबराया:
— तो मैं कैसे बचूं?
— तुम दूसरों से अलग हो। तुम्हें और विशेष विद्याएं सीखनी होंगी। क्या चाहते हो — छत्तीस या बहत्तर रूपांतरण?
— बहत्तर!
गुरु ने कान में कहा — और वुकोंग ने सुना।
उसी दिन से वो साधना में लग गया। बहत्तर रूपांतरण — एक-एक सीखता गया।
एक शाम, गुरु सभी शिष्यों के साथ बाहर बैठे थे।
— वुकोंग, तुमने क्या-क्या सीखा?
— गुरुदेव, सब कुछ।
— दिखाओ।
वुकोंग ने शरीर हिलाया — और एक देवदार का पेड़ बन गया। हरा, घना, अटल।
सब तालियाँ बजाने लगे। शोर मच गया। गुरु बाहर आए।
— चुप! तुम साधक हो या बाज़ारी?
फिर वुकोंग को बुलाया:
— यह विद्या दूसरों को दिखाने के लिए नहीं है। अगर कोई देख लेगा — वो माँगेगा। तुम दिया तो अच्छा, नहीं दिया तो दुश्मन। यह खतरनाक है।
— गुरुदेव, क्षमा करें।
— जाओ। यहाँ से चले जाओ।
वुकोंग की आँखें भर आईं:
— कहाँ जाऊं?
— जहाँ से आए थे।
— मैं बीस साल यहाँ रहा। गुरु का ऋण कैसे उतारूं?
— मेरा कोई ऋण नहीं। बस — कभी मत कहना कि मेरे शिष्य हो। अगर कहा, तो मैं तुम्हारी आत्मा को नौ गहरी जगहों में दफन करूंगा।
— कभी नहीं कहूंगा।
वुकोंग ने सबसे विदाई ली। और एक पलटी-बादल लगाई — और एक ही झटके में पुष्प-फल पर्वत वापस।
रास्ते में उसने मन में कहा:
जाते समय साधारण देह थी, आते समय हल्की और दिव्य।
दुनिया में कोई यत्न नहीं करता, लेकिन यत्न किया — तो मार्ग मिलता है।
समुद्र पार करना कठिन था जाते समय, आते समय आसान है।
गुरु के अंतिम शब्द अभी भी कानों में हैं — पूर्वी समुद्र दिख रहा है।
पुष्प-फल पर्वत पर पहुँचते ही — पक्षियों की आवाज़, वानरों का विलाप।
वुकोंग ने पुकारा:
— बच्चो! मैं आ गया!
हज़ारों वानर दौड़े। लेकिन रोते हुए बोले:
— महाराज! आप बीस साल से थे नहीं। एक राक्षस ने हमारी जलपर्दा गुफा पर कब्ज़ा कर लिया। हमारे बच्चे उठा ले गया। रात को नींद नहीं।
वुकोंग का क्रोध जागा:
— वो राक्षस कहाँ है?
— उत्तर में। "मिश्रित-जल गुफा"।
वुकोंग एक पलटी-बादल में उड़ा। पहुँचा। पहाड़ देखा — भयंकर, ऊँचा:
पत्थर की सीधी चोटियाँ, गहरी खाइयाँ।
बाईं ओर अजगर, दाईं ओर बाघ।
लोहे के बैल खेत जोतते,
सोने के बीज बोए जाते।
गुफा के सामने कुछ छोटे राक्षस नाच रहे थे। वुकोंग को देखकर भागे।
— भागो मत! अपने राजा को बताओ — पुष्प-फल पर्वत का मालिक आया है।
राक्षस राजा बाहर निकला — काली टोपी, काला कवच, बड़ी तलवार।
वो गरजा: — तुम कौन हो?
— मैं — पुष्प-फल पर्वत का वानर राजा। तुमने मेरे बच्चों को परेशान किया। अब हिसाब होगा।
राक्षस ने तलवार उठाई। वुकोंग खाली हाथ था।
— नन्हे बंदर, हथियार तक नहीं।
— हाथ ही काफी हैं।
दोनों भिड़े। वुकोंग छोटा था, लेकिन फुर्तीला। छोटे-छोटे वार करता। राक्षस बड़ा था, लेकिन धीमा। एक मौका मिलते ही वुकोंग ने उसकी कमर पर मुक्का मारा।
राक्षस डगमगाया। तलवार उठाई।
वुकोंग ने एक बाल निकाला, मुँह में चबाया, फूँक मारी:
— बदल जाओ!
दो-तीन सौ छोटे-छोटे वुकोंग बन गए। चारों ओर से हमला। राक्षस घबराया। वुकोंग ने असली रूप में उसकी तलवार छीनी — और एक ही वार में दो टुकड़े।
गुफा में घुसा। जितने राक्षस थे — सब खत्म।
बंदी वानर छूटे। अपना घर-सामान उठाया।
वुकोंग ने गुफा में आग लगाई। राख हो गया।
घर आकर सभी ने उत्सव मनाया। लेकिन वानरों ने पूछा:
— महाराज, वो गुफा तो मिली, लेकिन यहाँ कैसे आए? हम रास्ता नहीं जानते।
— यह उस राक्षस का जादू था। चिंता मत करो। मैं जानता हूँ।
वुकोंग ने मंत्र पढ़ा, तूफान उठाया — और सारे वानरों को घर ले आया।
बड़ी दावत हुई। खुशी के आँसू, हँसी।
वुकोंग ने बताया: — मैं बीस साल यात्रा करके एक गुरु के पास गया। जीवन के रहस्य सीखे। मेरा नाम है — सुन वुकोंग।
सभी ने खुशी मनाई:
— महाराज का नाम है — "सुन"! हम सब छोटे सुन, बड़े सुन, एक परिवार!
नारियल की शराब, अमृत-फल — सब ने मिलकर पिया।
एक ही उपनाम से जुड़ गए सब — मूल से मिलन। बस अब यात्रा आगे बढ़ेगी — देवताओं की सूची में नाम लिखेगा।
अगले अध्याय में — सुन वुकोंग के नए साहसिक कदम। क्या होगा आगे?