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अध्याय 19: युनझान गुफा में झू बाजिए का समर्पण और हृदय-सूत्र की प्राप्ति

सुन वुकोंग झू बाजिए को तांग सान्ज़ांग के पास लाता है और वह शिष्य बन जाता है। आगे फ़ूतू पर्वत पर 'घोंसले का ध्यानी' मिलता है जो तांग सान्ज़ांग को 'हृदय-सूत्र' देता है — पश्चिम की यात्रा का सबसे महत्त्वपूर्ण मंत्र।

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रात भर की लड़ाई के बाद राक्षस अपनी गुफा में भाग गया था। सुन वुकोंग उसके पीछे था।

पहाड़ से नीचे उतरा, उस ऊँचे पर्वत पर — वहाँ एक पत्थर पर खुदा था: "युनझान गुफा।" सुन वुकोंग ने दरवाज़ा तोड़ा —

— ओ सड़े हुए पाजी, निकलो!

राक्षस घबराया हुआ बाहर आया — नेलफोर्क लेकर।

— तू मेरे घर तक आया! क्या तेरे पास कोई कानून नहीं?

— कानून? तूने एक लड़की को छल से फँसाया — बिना किसी रीति-रिवाज़ के। सुन, मेरी गुरुजी के बारे में बात करने से पहले — तेरे पास क्या है?

राक्षस ने नेलफोर्क की शान में एक लंबी कविता सुनाई —

यह लोहा नहीं, दिव्य बर्फ़ से ढाला, स्वयं ताओ-उज्जवल ने हथौड़ा चलाया। पाँच दिशाओं के देव और छह देवदूत, इस नौ-दाँते को गढ़ने में लगे। इसे जब मैं उठाता — लपटें उठती, जब गिराता — बर्फ़ीली हवा चलती। स्वर्ग के देवता भी इससे घबराते, यमराज का कलेजा भी काँपता।

सुन वुकोंग हँसा —

— तो ठीक है — एक बार मेरे सिर पर मारो।

राक्षस ने पूरी शक्ति से प्रहार किया।

टन!

चिंगारियाँ उड़ीं — सुन वुकोंग की एक रोम भी न हिली।

— क्या था यह? मैंने तो महसूस ही नहीं किया।

राक्षस के हाथ-पाँव ढीले पड़ गए —

— कैसा सिर है यह!

— मुझे "बिमाव" कहते थे। स्वर्ग में सारे देवता मुझे तलवारों से काटते, हथौड़ों से पीटते — कुछ न हुआ। फिर ताओ-बुज़ुर्ग की भट्टी में डाला — अग्नि ने "आग-आँखें" बनाईं, "लोहे का सिर" बनाया। आओ, फिर मारो।

राक्षस ने नेलफोर्क नीचे कर लिया।

— तू मेरा नाम जानता था — तो क्या तू उस "यात्री" का शिष्य है?

— हाँ। "तांग सान्ज़ांग" — पूर्व के तांग साम्राज्य से। वे बुद्ध के ग्रंथ लाने पश्चिम जा रहे हैं।

राक्षस ने नेलफोर्क फेंक दिया —

— तो मुझे उनके पास ले जाओ। गुआनयिन बोधिसत्त्व ने मुझे यहाँ प्रतीक्षा करने को कहा था — ठीक इसी काम के लिए।

— झूठ नहीं बोल रहे?

— मैं आकाश की ओर क़सम खाता हूँ। अगर झूठ बोलूँ तो लाखों टुकड़े हो जाऊँ।

— तो पहले यह गुफा जला दो।

राक्षस ने घास-लकड़ियाँ इकट्ठी कीं, आग लगाई। "युनझान गुफा" भस्म हो गई — एक टूटे हुए भट्टे की तरह।

— अब मेरे साथ चलो।

सुन वुकोंग ने एक बाल से रस्सी बनाई, हाथ पीठ पर बाँधे, कान पकड़कर खींचा —

— अरे! कान दर्द होता है — हल्के से!

— "भले सूअर को कठोरी से पकड़ो" — यही कहावत है। जब तक गुरुजी के सामने पेश न करूँ — ऐसे ही चलोगे।

दोनों आधे बादल में उड़ते, आधे पाँव पर चलते — ग़ालाओ गाँव पहुँचे।


गाँव में तांग सान्ज़ांग बुज़ुर्गों के साथ बैठे थे। सुन वुकोंग ने राक्षस को लाकर दिखाया —

गाओ परिवार ने कहा —

— यही है हमारा वह दामाद!

राक्षस ने झुककर प्रणाम किया। सारी कहानी सुनाई।

तांग सान्ज़ांग प्रसन्न हुए —

— ताइगोंग, एक अगरबत्ती लाइए।

दक्षिण दिशा में झुककर बोधिसत्त्व को प्रणाम किया।

फिर राक्षस को कहा —

— मेरे बड़े शिष्य का नाम "वु-कोंग" है। तुम "वु-नेंग" — "जागृत क्षमता" — होगे। पाँच मांस और तीन वर्जनाएँ तुम पहले से जानते हो — इन्हें निभाना। अब से तुम्हें "झू बाजिए" — "आठ सावधानियाँ" — भी कहेंगे।

झू बाजिए ने माथा टेका।

रस्सी खुली। झू बाजिए ने पहले तांग सान्ज़ांग को, फिर सुन वुकोंग को प्रणाम किया —

— भाई साहब।

सुन वुकोंग ने उसकी पीठ थपथपाई।

दावत हुई। झू बाजिए ने घर भर का खाना अकेले खाया।


तीनों आगे चले। कई महीने बाद एक ऊँचा पर्वत सामने आया।

तांग सान्ज़ांग ने लगाम खींची —

— आगे पर्वत है। सँभलकर।

झू बाजिए बोले —

— यह "फ़ूतू पर्वत" है। इस पर "घोंसले का ध्यानी" रहते हैं — महान साधु। एक बार उन्होंने मुझे भी बुलाया था। मैं नहीं गया।

पर्वत सुंदर था —

दक्षिण में नीली चीड़ और हरे देवदार, उत्तर में लाल आड़ू और हरी विलो। उन्मुक्त पक्षियों की जोड़ियाँ बोलतीं, बादलों के बीच से सारस उड़ते। फूलों की हज़ार क़िस्में महकती, घास की अनगिनत जड़ी-बूटियाँ।

पेड़ों के बीच एक घोंसले का घर था। बाईं ओर मृग, दाईं ओर बंदर।

झू बाजिए ने इशारा किया —

— वही हैं!

तांग सान्ज़ांग घोड़े से उतरे। ध्यानी ने हाथ उठाया —

— संत, आइए। आइए।

झू बाजिए ने प्रणाम किया। ध्यानी चौंके —

— अरे — तुम "फ़ूलिंग पर्वत का झू गांगलिए" हो! इतनी बड़ी किस्मत कहाँ से मिली कि इनके साथ चल रहे हो?

— गुआनयिन की कृपा से।

ध्यानी ने सुन वुकोंग की ओर देखा —

— यह कौन है?

— मेरा बड़ा शिष्य — सुन वुकोंग।

— पहचान नहीं — माफ़ करना।

सुन वुकोंग मुस्कुराया —

— यह संत मुझे नहीं जानते — लेकिन झू बाजिए को पहचानते हैं!

तांग सान्ज़ांग ने विनम्रता से पूछा —

— पश्चिम में "महा-गर्जना मंदिर" कितनी दूर है?

— बहुत दूर। राक्षस और जंगल बीच में बहुत हैं।

— पर कोई रास्ता है?

ध्यानी ने कहा —

— रास्ता कठिन ज़रूर है, पर पहुँचने का दिन आएगा। बस एक बात — "माया-विघ्न" को पार करना होगा। इसलिए मैं तुम्हें एक ग्रंथ देता हूँ — "बहुत-हृदय सूत्र" — कुल पचपन वाक्य, दो सौ सत्तर अक्षर। जब भी माया मिले — यह पढ़ना। कोई हानि न होगी।

तांग सान्ज़ांग ने भूमि पर माथा टेका।

ध्यानी ने एक बार मुँह से सुनाया। यह था —

"महा-प्रज्ञापारमिता हृदय सूत्र: अवलोकितेश्वर बोधिसत्त्व जब गहरी प्रज्ञापारमिता में थे, उन्होंने देखा — पाँचों स्कंध खाली हैं। 'रूप' शून्य से अलग नहीं, शून्य रूप से अलग नहीं। रूप ही शून्य है, शून्य ही रूप। भावना, संकल्प, संस्कार, विज्ञान — सब भी यही। समस्त धर्म शून्य-लक्षण — न जन्म न मृत्यु, न मैल न निर्मलता, न वृद्धि न ह्रास। इसलिए शून्य में — न रूप, न भावना, न संकल्प, न संस्कार, न विज्ञान। न आँख, न कान, न नाक, न जीभ, न देह, न मन। न रंग, न ध्वनि, न गंध, न स्वाद, न स्पर्श, न धर्म। न अज्ञान, न अज्ञान का अंत। न जरा-मृत्यु, न उसका अंत। न दुःख, न समूह, न निरोध, न मार्ग। न ज्ञान, न प्राप्ति। इसी 'प्राप्ति-रहित' से — बोधिसत्त्व प्रज्ञापारमिता पर निर्भर, चित्त बाधा-रहित, भय-रहित। भ्रम-स्वप्न से दूर — पूर्ण निर्वाण। तीनों लोकों के बुद्ध प्रज्ञापारमिता से — "अनुत्तर-समक्-सम्-बोधि" प्राप्त करते। प्रज्ञापारमिता महा-मंत्र है, महा-प्रकाश मंत्र, अनुत्तर मंत्र — सब दुःखों को दूर करने वाला, सत्य। मंत्र: 'गते गते पारगते पारसम्गते बोधि स्वाहा!'"

तांग सान्ज़ांग की एक बार सुनते ही यह हृदय में उतर गया। आज तक संसार में प्रचलित है।

सूत्र देकर ध्यानी उड़ने को हुए। तांग सान्ज़ांग ने पूछा —

— पश्चिम की राह कैसी है?

ध्यानी ने मुस्कुराकर कहा —

राह कठिन नहीं, ध्यान से सुनो — हज़ार नदियाँ, हज़ार पर्वत। राक्षस और माया के जंगल। "कान-चोटी" पर सँभलकर चलना, "काली चीड़ का वन" सावधानी से। राज्यों में देव और पिशाच, पहाड़ों पर शेर और भेड़िए राजा। जंगली सूअर गट्ठर उठाए, जल-राक्षस सामने खड़े। एक पुराना-पत्थर बंदर — वही बताएगा पश्चिम की राह।

सुन वुकोंग हँसा —

— हमसे पूछो — मैं ख़ुद बता दूँगा।

पर तांग सान्ज़ांग ने कहा — वे "पुराना पत्थर बंदर" — यही सुन वुकोंग हैं। "जंगली सूअर गट्ठर उठाए" — झू बाजिए।

झू बाजिए बोले —

— यह ध्यानी भविष्य जानते हैं। "जल-राक्षस" वाली बात सच होगी या नहीं — देखते हैं।

तांग सान्ज़ांग उठे — ध्यानी को प्रणाम करने। सुन वुकोंग ने छड़ी उठाकर घोंसले की ओर फेंकी।

कमल के फूल खिले, धुंध की परतें छा गईं।

छड़ी लौट आई। घोंसला अछूता।

तांग सान्ज़ांग ने सुन वुकोंग का हाथ पकड़ा —

— यह ध्यानी जैसे महान संत हैं — उनका घर क्यों तोड़ते हो?

— उन्होंने मुझे और झू बाजिए को गाली दी।

— उन्होंने पश्चिम की राह बताई। गाली कहाँ है?

— "जंगली सूअर" झू बाजिए की गाली है। "पुराना पत्थर बंदर" मेरी।

झू बाजिए बोले —

— भाई, क्रोध छोड़ो। ध्यानी आगे की बात जानते हैं। "जल-राक्षस" वाली बात भी सच होगी — देखते हैं। उन्हें जाने दो।

सुन वुकोंग को समझ आई। तीनों पश्चिम की ओर चल दिए।

मन शुद्ध हो तो राह सीधी, इच्छाएँ शांत हों तो दुनिया शांत। मन-बंदर और इच्छा-अश्व साथ चलें, तो पश्चिम का द्वार स्वयं खुलता है।