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अध्याय 18: ग़ालाओ गाँव का सूअर-दामाद और झू बाजिए का समर्पण

सुन वुकोंग काश्यप लेकर लौटता है। आगे चलकर ग़ालाओ गाँव में सूअर-मुँह वाले राक्षस से सामना होता है जो वृद्ध गाओ की बेटी से ब्याह रचाए बैठा है। सुन वुकोंग चाल चलकर उसे पहचानता है — वह स्वर्ग का पूर्व मार्शल झू बाजिए है, जिसे गुआनयिन ने तीर्थयात्रा की प्रतीक्षा में रखा था।

पश्चिम की यात्रा अध्याय 18 झू बाजिए ग़ालाओ गाँव सुन वुकोंग तांग सान्ज़ांग सूअर राक्षस गुआनयिन

गुआनयिन बोधिसत्त्व को प्रणाम कर सुन वुकोंग काश्यप उठाए पंख फैलाकर उड़ा। मठ पहुँचते ही तांग सान्ज़ांग खड़े हो गए —

— काश्यप वापस आई!

भिक्षुओं ने एक-दूसरे को थामा, आँखें भर आईं।

रात बाकी थी। अगले दिन सुबह घोड़ा लीपा-पोता गया, गट्ठर बाँधे गए, और दोनों आगे चल पड़े। वसंत का मौसम था —

घास में सफ़ेद घोड़े के खुर धँसते, विलो की सुनहरी लड़ियाँ ओस में लहराती। आड़ू और खुबानी के वन रंगों में लड़ते, बेलें पगडंडी पर उमंग से झूमती। बालू-पथ पर धूप में बत्तखें सोती, पहाड़ी झरने पर फूलों की महक।

पाँच-सात दिन निर्जन राह चली। एक शाम, दूर एक गाँव दिखा।

तांग सान्ज़ांग बोले —

— आगे बस्ती है। रात वहीं गुज़ारें?

— रुकिए, पहले देखकर आता हूँ — सुन वुकोंग बोला।

उसने आँखें तेज़ कीं —

बाँस की घनी बाड़, छप्पर के मकान। घने जंगली पेड़ द्वार तक झुके, टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर गाय-भेड़ लौट रहे। तृप्त मुर्ग़े और सुअर छप्पर के कोने में, नशे में झूमते बुज़ुर्ग गीत गाते।

— गुरुजी, चलिए — अच्छे लोगों का गाँव है — सुन वुकोंग ने कहा।

गाँव के मुहाने पर एक युवक मिला — सिर पर कपड़े की टोपी, नीली जाकेट, हाथ में छाता, पीठ पर गट्ठर।

सुन वुकोंग ने उसका हाथ थाम लिया —

— रुको भाई, यह गाँव क्या है?

युवक ने छुड़ाने की कोशिश की —

— जाने दो! मैं अकेला जा सकता हूँ!

— जाओगे ज़रूर — पहले बताओ।

युवक ने छटपटाया, पर छूट न सका — मानो लोहे की पकड़ में हो। उसने गट्ठर पटका, दोनों हाथों से खींचा — बेकार।

तांग सान्ज़ांग ने कहा —

— उसे छोड़ दो। वे दूसरे लोग आ रहे हैं।

— गुरुजी, इसी से काम निकलेगा — सुन वुकोंग मुस्कुराया।

युवक बोला —

— यह "ग़ालाओ गाँव" है। ज़्यादातर लोग गाओ उपनाम के हैं — इसीलिए यह नाम है। अब जाने दो!

— और तुम इतने सामान के साथ कहाँ जा रहे हो?

— मेरे मालिक गाओ ताइगोंग ने मुझे भेजा है — उनकी सबसे छोटी बेटी को तीन साल से एक राक्षस ने रोक रखा है। वह उसका दामाद बनकर घर में घुस गया। ताइगोंग परेशान हैं — कई ओझा और साधु बुलाए, सब नाकाम रहे। आज फिर ढूँढने निकला हूँ। तुम्हारी वजह से फँस गया — दोनों तरफ़ से मार खा रहा हूँ!

सुन वुकोंग हँसा —

— तुम्हारी क़िस्मत अच्छी है। हम वैसे नाकाम साधु नहीं हैं। राक्षसों को पकड़ना हमारा काम है। चलो, हमें अपने मालिक के घर ले चलो।

युवक का नाम "गाओ-त्साई" था। लाचार होकर वह उन्हें लेकर चल पड़ा।


वृद्ध गाओ ताइगोंग बाहर आए — काली टोपी, हरा-सफ़ेद अंगरखा, भूरे बूट।

उन्होंने तांग सान्ज़ांग का स्वागत किया। सुन वुकोंग को देखकर थोड़े सहमे, लेकिन भीतर आने का इशारा किया।

बैठकर गाओ ताइगोंग ने कहा —

— मेरी तीन बेटियाँ थीं। दो की शादी हो गई। तीसरी — "त्सुई-लान" — के लिए घर-जमाई ढूँढ रहे थे। तीन साल पहले एक काला मोटा आदमी आया — कहा, "फ़ूलिंग पर्वत से हूँ, नाम 'झू गांगलिए।' माँ-बाप-भाई कोई नहीं। घर-जमाई बन जाऊँगा।" पहले तो ठीक था — खेत जोते, फ़सल काटी, सुबह आता शाम जाता। लेकिन धीरे-धीरे रूप बदल गया — लंबा थूथन, बड़े कान, सूअर की शक्ल। खाना भी ज़बरदस्त — सौ रोटियाँ नाश्ते में, हर खाने में तीन-पाँच मन चावल। अब तो बेटी को पिछले हिस्से में बंद कर दिया है — छह महीने से मिलने भी नहीं दिया।

सुन वुकोंग बोला —

— चिंता मत करो। आज रात ही पकड़ लेते हैं।

खाना खाकर जब रात उतरी, सुन वुकोंग ने पिछले हिस्से का दरवाज़ा एक धक्के में खोला। अंदर था —

उलझे बाल, धुँधला चेहरा, चेरी-होंठों में रंग नहीं। पतली कमर, झुकी पीठ, आँखें नम, आवाज़ धीमी।

बेटी रोते हुए पिता से लिपट गई।

सुन वुकोंग ने कहा —

— रोओ मत। वह राक्षस कहाँ गया?

— दिन में जाता है, रात में आता है। हवा-बादल में आता-जाता है — कहाँ से, कहाँ को, मालूम नहीं।

— ठीक है। ताइगोंग, बेटी को आगे ले जाइए। मैं यहाँ रुकता हूँ।

सुन वुकोंग ने एक पल में बेटी का रूप ले लिया और अंधेरे कमरे में बैठ गया।

थोड़ी देर में — एक तूफ़ानी हवा उठी —

पहले धीमी, फिर बेलगाम, पत्थर उड़े, पेड़ धराशायी। नदियाँ पलट गईं, समुद्र उफान पर, लोहे की मीनारें बुद्ध के सिर को छूने लगीं।

हवा में एक राक्षस उतरा — काला चेहरा, छोटी आँखें, लंबा थूथन, बड़े-बड़े कान। नीली-काली पोशाक।

वह सीधे कमरे में घुसा, हाथ फैलाया —

सुन वुकोंग ने उसे एक झटके में नीचे पटका।

राक्षस उठा —

— क्या हुआ? तुम नाराज़ हो आज?

— नाराज़ नहीं। बस ज़रा मन ठीक नहीं।

— तो कपड़े उतारकर सो जाओ।

सुन वुकोंग शौचालय की ओर खिसक गया। राक्षस बिस्तर पर लेट गया।

— कहाँ गई?

— बस आ रही हूँ। तुम पहले सो जाओ।

राक्षस लेट गया।

सुन वुकोंग ने आह भरी —

— क़िस्मत कम रही।

राक्षस चौंका —

— क्यों? मैंने तुम्हारे घर क्या कम किया? खेत जोते, मकान बनाया, दिन-रात मेहनत की। शिकायत क्या है?

— पिता कह रहे हैं तुम्हारा चेहरा देखकर रिश्तेदार शर्माते हैं। तुम कहाँ से हो, क्या नाम है — किसी को कुछ पता नहीं।

— मेरा घर "फ़ूलिंग पर्वत, युनझान गुफा" है। मेरा नाम "झू गांगलिए" है। यह उन्हें बता दो।

— और अगर उन्होंने किसी ओझे को बुला लिया?

राक्षस हँसा —

— सोती रहो, कोई नहीं पकड़ सकता। मेरे पास स्वर्गीय परिवर्तन की कलाएँ हैं, नौ दाँतों वाला नेलफोर्क है।

— सुना है — पाँच सौ साल पहले स्वर्ग में उत्पात करने वाले एक "सुन" नाम के संत को बुलाया है।

राक्षस उठ बैठा — तीन पल के लिए डर गया —

— तो जाना होगा। उस बंदर से मैं उलझना नहीं चाहता।

— क्यों जा रहे हो?

— वह "बिमाव" कुछ भी कर सकता है। इज़्ज़त बचानी है।

राक्षस ने कपड़े पहने और बाहर भागने लगा — सुन वुकोंग ने उसकी बाँह थाम ली। अपने असली रूप में आया —

— आँखें खोलकर देख — मैं कौन हूँ?

राक्षस ने देखा — आग-आँखें, लोहे का चेहरा।

वह बिजली की तेज़ी से हवा बनकर उड़ गया।

सुन वुकोंग पीछे लपका —

— आकाश में जाओ तो "दुनिया-दरबार" तक पीछे आऊँगा, धरती में जाओ तो नर्क तक!


रात भर पीछा करते हुए सुन वुकोंग एक ऊँचे पर्वत पर जा पहुँचा। राक्षस एक गुफा में घुस गया — और एक नौ दाँतों वाला नेलफोर्क लेकर बाहर आया।

— नापाक बंदर! तू मेरे घर तक आया — ले, यह चखो!

दोनों काली रात में लड़े। चोट पर चोट। भोर होने लगी।

— रुक, एक बात पूछता हूँ — सुन वुकोंग ने कहा। — तू मेरा नाम कैसे जानता था?

— मैं "तियान-पेंग युआनशुआई" था — स्वर्ग की नदियों का सेनापति। उस साल जब तूने स्वर्ग में उत्पात मचाया, मैं भी वहाँ था। फिर एक बार — देव-उत्सव में मैंने शराब पी, "चांग-ई" की कक्षा में घुस गया — बदतमीज़ी हुई। यमराज ने दो हज़ार हथौड़े मारे, और मुझे धरती पर जन्म लेने की सज़ा मिली। पर जन्म लेते वक़्त रास्ता भटक गया — सूअर की कोख में जा पड़ा।

सुन वुकोंग ने छड़ी उठाई — लेकिन राक्षस ने कहा —

— ठहरो। गुआनयिन बोधिसत्त्व ने मुझसे कहा था — "यहाँ रुको, एक पूर्व की यात्रा करने वाले भिक्षु आएँगे — उनके साथ पश्चिम जाओ।" क्या वह भिक्षु तुम्हारे गुरु हैं?

— हाँ। "तांग सान्ज़ांग" — तांग साम्राज्य के सम्राट के भाई और बौद्ध धर्म के महागुरु।

राक्षस ने नेलफोर्क नीचे रख दिया।

— तो फिर मुझे उनके पास ले चलो।

सुन वुकोंग ने एक बाल से रस्सी बनाई, उसे पीछे हाथ बाँधे, और कान से खींचते हुए ले चला।

— हल्के से खींचो — कान दर्द होता है!

— चुपचाप चलो।


ग़ालाओ गाँव में तांग सान्ज़ांग और बुज़ुर्ग गाओ सहित सब रात भर जागते रहे।

भोर में आँगन में सुन वुकोंग प्रकट हुआ — पीछे पिटा हुआ राक्षस हाथ पीठ पर बँधे।

गाओ के रिश्तेदार चिल्लाए —

— यही है! यही हमारा वह दामाद!

राक्षस घुटने टेककर तांग सान्ज़ांग के सामने झुका —

— गुरुजी, मैं अपराधी हूँ। अगर पहले पता होता कि आप यहाँ हैं, तो स्वयं आकर प्रणाम करता। बोधिसत्त्व ने मुझे यही इंतज़ार करने को कहा था।

सुन वुकोंग ने नेलफोर्क से उसे थपथपाया —

— बोलो ज़रा।

राक्षस ने सब बताया — स्वर्ग में सेनापति था, सज़ा मिली, गुआनयिन का निर्देश।

तांग सान्ज़ांग ने गाओ ताइगोंग से अगरबत्ती माँगी। दक्षिण की ओर झुककर प्रणाम किया —

— बोधिसत्त्व की असीम कृपा।

फिर राक्षस की ओर मुड़े —

— मेरे शिष्य का नाम "वु-कोंग" है — "जागृत शून्यता"। तुम्हारा नाम होगा "वु-नेंग" — "जागृत क्षमता।" और मैं तुम्हें "झू बाजिए" — "आठ सावधानियों वाला सूअर" — कहूँगा। पाँच मांस, तीन वर्जनाएँ — इन्हें याद रखना।

झू बाजिए ने खुशी से माथा टेका —

— गुरुजी का आदेश सिर-माथे।


गाओ ताइगोंग ने दावत सजाई। झू बाजिए ने दस से अधिक कटोरे चावल खाए — अकेले पूरे घर का खाना।

जाते वक़्त ताइगोंग ने दो सौ ताँगे चाँदी-सोने की थैली निकाली।

सुन वुकोंग ने एक मुट्ठी उठाई और गाओ-त्साई को दी —

— कल तुमने रास्ता दिखाया — यह इनाम। आगे राक्षस मिले तो हमें बुलाना।

तांग सान्ज़ांग घोड़े पर थे। झू बाजिए ने गट्ठर उठाया। सुन वुकोंग आगे छड़ी लेकर चला।

तीनों पश्चिम की ओर चल पड़े।

झू बाजिए जाते-जाते पीछे मुड़ा —

— दादा-ससुर, साली-सास — सबको मेरा नमस्कार। जब तक तीर्थ पूरा न हो, वापस न आऊँगा। पर अगर कभी रास्ता बदल जाए — तो मैं वापस आकर फिर दामाद बन सकता हूँ!

सुन वुकोंग ने धकेला —

— बकवास बंद। चलो।

धरती-आकाश में तीन भाई चले, चाँद-सूरज के साथ पश्चिम को रवाना। लोहे की छड़ और नौ-दाँता काँटा, शून्य की राह पर अब साथ चला बेड़ा।