अध्याय 17: कृष्ण-पवन पर्वत का उत्पात और गुआनयिन का चमत्कार
सुन वुकोंग कृष्ण-पवन पर्वत पर जाकर राक्षस से काश्यप माँगता है। कई बार युद्ध में कोई नहीं जीतता। अंततः गुआनयिन बोधिसत्त्व स्वयं आकर एक चालाक योजना से काश्यप वापस लाती हैं और भालू-राक्षस को अपना संरक्षक बना लेती हैं।
सुन वुकोंग एक पलटी खाकर पर्वत पर उतरा। मठ के भिक्षु माथा टेकते रह गए।
पर्वत सुंदर था — वसंत का मौसम था —
हज़ार खाइयों में धाराएँ बह रही हैं, हज़ार चट्टानों पर सुंदरता चमक रही है। पक्षी पुकारते हैं पर दिखते नहीं, फूल झरते हैं पर पेड़ सुगंधित हैं। बारिश के बाद नीली दीवारें चमकती हैं, हवा से पन्ने के पर्दे झूलते हैं।
पर्वत का नज़ारा देखते-देखते सुन वुकोंग ने एक ऊँची आवाज़ सुनी — तीन अजीब आकृतियाँ घास के मैदान में बैठकर बातें कर रही थीं।
एक काला हट्टा-कट्टा, एक भेषधारी साधु, एक सफ़ेद कुर्ते वाला।
काले ने कहा —
— परसों मेरा जन्मदिन है। आप दोनों आइएगा।
सफ़ेद वाला बोला —
— हर साल आपको बधाई देते हैं, इस साल क्यों नहीं आएंगे?
काला हँसा —
— पिछली रात एक अद्भुत वस्तु मिली — एक सुनहरी काश्यप। कल उसी के नाम पर जश्न मनाएंगे — "बुद्ध-वस्त्र उत्सव"!
सुन वुकोंग ने सुना — झपटा —
— ओ चोरों! मेरी काश्यप से उत्सव! लाओ वापस!
काला हट्टा-कट्टा हवा बनकर उड़ गया, साधु भी। केवल सफ़ेद कुर्ते वाला पकड़ में आया — मारा — एक सफ़ेद फूल-चित्रित साँप था।
सुन वुकोंग उसे लेकर गहरे पर्वत में घुसा। एक गुफा का द्वार मिला —
धुंध में ढका, देवदार-पाइन घने, चट्टानें चौड़ी, बेलें छाई हुईं। पुल पर सूखी लकड़ियाँ, चोटी पर शैवाल-बेल। हालाँकि वीराना — पर सेना की तरह भव्य।
पत्थर के द्वार पर लिखा था — "कृष्ण-पवन पर्वत, कृष्ण-पवन गुफा।"
सुन वुकोंग ने छड़ घुमाकर दरवाज़ा ठोका —
— दरवाज़ा खोलो!
छोटे राक्षस निकले। राक्षस-राज ने आदेश पाकर अपना कवच पहना, काली भाला उठाया और निकला —
लौह-टोप पर काली आभा, काले-सोने का कवच चमकदार। काली रेशम की पोशाक, काले चमड़े के बूट। आँखें बिजली-सी, यही है कृष्ण-पवन पर्वत का राजा।
सुन वुकोंग हँसा —
— यह तो भट्टी से निकले कोयला-जलाने वाले जैसा लगता है। तुम्हारा धंधा क्या है?
— चोर! अपनी काश्यप लौटाओ — वरना तुम्हारी गुफा ही उखाड़ दूँगा।
— वह काश्यप मैंने उस जलते मठ से उठाई थी। यह मेरे उत्सव का सामान है। तुम कौन हो?
— मैं तांग साम्राज्य के तथागत बुद्ध के तीर्थयात्री का शिष्य हूँ।
दोनों लड़े। दसेक चक्कर हुए, बराबरी रही। दोपहर हुई। राक्षस ने कहा —
— रुक, खाना खाकर आता हूँ। फिर लड़ेंगे।
— नामर्द! खाने के लिए बीच में रुकता है? मैं पाँच सौ साल से पत्थर में दबा रहा — एक बूँद नहीं पिया। बुज़दिल मत बन — काश्यप दे और जाने दे।
राक्षस ने झूठा हमला किया और गुफा में घुस गया। दरवाज़ा बंद।
सुन वुकोंग मठ में लौटा। तांग सान्ज़ांग राहत के साथ मिले।
— काश्यप?
— उस राक्षस के पास है। वह भालू का राक्षस है। दिन भर लड़ा — बराबरी। वह गुफा में बंद है।
तांग सान्ज़ांग —
— मैं गुआनयिन को बुलाने जाऊँगा।
— आप यहाँ रहिए। मैं जाता हूँ।
सुबह सुन वुकोंग दक्षिण सागर गया। पूताओ पर्वत पर उतरा।
गुआनयिन के देवदूतों ने उसे देखकर कहा —
— महान संत आए! बोधिसत्त्व ने कहा था — आप ठीक राह पर हैं।
सुन वुकोंग ने बोधिसत्त्व को प्रणाम किया —
— बोधिसत्त्व, मुझे क्षमा करें। आपके मठ में एक भालू-राक्षस ने गुरुजी की काश्यप चुराई। कई बार लड़ चुका हूँ — बराबरी ही रही। गुरुजी का वह कड़ा-मंत्र याद आता है — आकर उस राक्षस से काश्यप वापस दिलाइए।
गुआनयिन बोलीं —
— यह बंदर बहुत बेशर्म है। उस भालू की शिकायत मुझसे? तुमने ही उस मठ में आग लगाई — मेरी जगह जलाई — और शिकायत मुझसे?
सुन वुकोंग ने माथा टेका —
— आप पहले से सब जानती हैं। कसने वाले मंत्र के डर से यहाँ आया। कृपया साथ चलिए।
गुआनयिन ने कहा —
— उस भालू की शक्ति तुमसे कम नहीं। चलो — तांग सान्ज़ांग के भले के लिए।
दोनों पर्वत की ओर चले।
रास्ते में एक साधु मिला — हाथ में शीशे की थाली पर दो गोलियाँ — "जन्मदिन की भेंट" लेकर जा रहा था।
सुन वुकोंग ने झपटा — एक डंडे में काम तमाम।
— अरे! — गुआनयिन चौंकीं। — तुमने बिना कारण उसे मार दिया?
— यह उस भालू का मित्र था — कल घास के मैदान में देखा था। आज जन्मदिन की भेंट लेकर जा रहा था।
— ठीक है।
सुन वुकोंग ने देखा — एक बूढ़ा नीला भेड़िया था। थाली के नीचे "लिंगशूज़ी निर्मित" लिखा था।
— बोधिसत्त्व, एक चाल चलें। यह थाली में दो गोलियाँ हैं — भेंट के रूप में। थाली पर नाम है "लिंगशूज़ी"। आप उसी साधु का रूप लें, मैं एक गोली बनकर थाली पर बैठ जाता हूँ — थोड़ा बड़ा। उस राक्षस को बड़ी गोली खाने दो। उसके पेट में जाकर मैं जो करूँगा — वह काश्यप ख़ुद सौंप देगा।
— ठीक है।
गुआनयिन ने साधु का रूप लिया —
शांत आभा, लहराती चादर, आसमान में उड़ने-सा हल्कापन। पुराने चेहरे पर पाइन-देवदार की उम्र, रूप जो प्राचीन और आधुनिक दोनों में अनोखा। आते-जाते बिना रुके, अपने में ही अद्भुत। सब एक धर्म की ओर, केवल दुष्ट आत्मा का अंतर।
सुन वुकोंग को देखकर बोलीं —
— कमाल! और क्या रूप देखूँ — राक्षस बोधिसत्त्व, या बोधिसत्त्व राक्षस?
— बोधिसत्त्व और राक्षस — दोनों एक विचार से। मूल में दोनों कहीं नहीं।
सुन वुकोंग ने समझा — और वह एक गोली बन गया —
थाली पर बिना रुके घूमता, गोल, चमकदार, बिना सीमा। तीन-तीन छह-छह संख्या का संयोग, बाहर-भीतर शीशे की आभा।
गुआनयिन ने ध्यान से उसे पहचाना — और वह बड़ी गोली थाली पर थी।
फिर वे गुफा के द्वार पर पहुँचीं। चौकीदार राक्षसों ने "लिंगशूज़ी" को पहचाना —
— महान लिंगशूज़ी आए!
राक्षस उछलकर बाहर आया —
— मित्र, आज ही भेंट लेकर आ गए?
गुआनयिन ने कहा —
— पहले जन्मदिन की यह भेंट देखो।
दो गोलियाँ पेश कीं। राक्षस ने बड़ी गोली अपनी ओर खिसकाई —
— यह सुंदर गोली आपके लिए।
— नहीं-नहीं, बड़ी आप लें।
राक्षस ने मुँह खोला, गोली नीचे लुढ़की।
अंदर जाते ही — सुन वुकोंग प्रकट हुआ। राक्षस ज़मीन पर लोट गया। गुआनयिन ने असली रूप दिखाया —
— काश्यप कहाँ है?
राक्षस ने देकर दी।
सुन वुकोंग नाक से बाहर निकला।
गुआनयिन ने एक और छोटा कड़ा आकाश से फेंका — राक्षस के सिर पर।
राक्षस उठा, भाला उठाया, हमला करने चला — गुआनयिन और सुन वुकोंग ऊपर थे। गुआनयिन ने मंत्र पढ़ा।
राक्षस का सिर दर्द से तड़प उठा। भाला छूट गया, वह ज़मीन पर लोटने लगा।
आसमान में सुन वुकोंग हँसता रहा, नीचे भालू राक्षस कराहता रहा।
— ओ पाजी! क्या अब झुकते हो?
— झुकता हूँ! जान बख़्श दो!
सुन वुकोंग उसे मारना चाहता था। गुआनयिन ने रोका —
— रुको। मुझे उसकी ज़रूरत है।
— क्यों?
— मेरे पूताओ पर्वत के पीछे पहरेदार नहीं है। यह वहाँ "पर्वत-रक्षक देव" बनेगा।
सुन वुकोंग हँसा —
— सच में दयालु हैं! एक भी जीव न खोया। मेरे पास यह मंत्र होता तो सौ बार पढ़ता!
भालू राक्षस उठा, हाथ जोड़कर गुआनयिन के पीछे चल पड़ा। एक जंगली मन अब शांत हो गया था।
गुआनयिन ने सुन वुकोंग से कहा —
— लौट जाओ। गुरु की अच्छी तरह सेवा करो। आलस मत करो।
— शुक्रिया। मैं थोड़ा वापस छोड़ आऊँगा।
— ज़रूरत नहीं।
सुन वुकोंग ने काश्यप उठाई, झुककर विदा ली, और मठ की ओर उड़ा।
शुभ प्रकाश स्वर्ण-मूर्ति पर बरसा, दस हज़ार रंगों की चमक अद्भुत। दुनिया के दुःखियों पर दया, सारे संसार में कमल-पदचिह्न। तीर्थयात्री को आगे भेजने आई थीं, जाते वक़्त एक दाग़ भी नहीं। राक्षस को सच्चाई की ओर मोड़ा, शून्य के द्वार पर काश्यप वापस आई।