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अध्याय 16: गुआनयिन मठ में लालची भिक्षु और चोरी गई काश्यप

गुआनयिन मठ का एक लालची वृद्ध भिक्षु तांग सान्ज़ांग की अमूल्य काश्यप चुराना चाहता है और उन्हें जलाकर मारने की योजना बनाता है। सुन वुकोंग आग को काबू में करता है लेकिन कृष्ण-पवन राक्षस काश्यप चुरा ले जाता है।

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श्रेष्ठ उद्यान में पन्ने की हरियाली, तीर्थ का आनंद सबसे बड़ा। सच है — पवित्र धरती मनुष्यों में दुर्लभ, पूरी दुनिया में पहाड़ों पर भिक्षु ही रहते हैं।

दोनों सवारी करते हुए आगे बढ़े। एक पर्वत की तलहटी में एक भव्य मठ दिखा —

परत-दर-परत मंडप, गलियारे फैले हुए। तीन दिशाओं में द्वार, रंगीन बादल छाए। पाँच मंगल-कक्षों में हज़ार लाल धुंध। घड़ी-घड़ाल ऊँचे, स्तूप-मीनार तेज़। ध्यान में लीन भिक्षु, पेड़ों पर पक्षी।

सच में पवित्र धरती पर बड़ा कम मनुष्य, दुनिया भर के पहाड़ भिक्षुओं ने घेर रखे हैं।

तांग सान्ज़ांग उतरे, सुन वुकोंग ने सामान रखा। प्रवेश करने से पहले भिक्षुओं का एक झुंड आता दिखा —

बाईं ओर टोपियाँ, शुभ्र वस्त्र। ताँबे के कुंडल कानों में, कपड़े की पेटी कमर में। घास की जूतियाँ, हाथ में लकड़ी की मछली। मुँह में मंत्र, बुद्ध की शरण में।

तांग सान्ज़ांग ने नमस्कार किया। भिक्षुओं ने अंदर बुलाया।

जब सुन वुकोंग पास आया, भिक्षु डर गए —

— यह कौन-सी जीव है?

— चुपके से। वह जल्दी नाराज़ होता है — यह मेरा शिष्य है।

अंदर पहुँचे — "गुआनयिन मठ" का नाम था। तांग सान्ज़ांग ने खुशी से बोधिसत्त्व को प्रणाम किया।

फिर एक वृद्ध भिक्षु आए — दो लड़के सहारा दे रहे थे। चेहरे पर झुर्रियाँ, पीठ झुकी, दाँत टूटे, चाल लड़खड़ाती थी।

— मैं सुना — पूर्व से संत आए हैं — इसलिए मिलने आया।

— आप कितने वर्ष के हैं?

— दो सौ सत्तर।

सुन वुकोंग धीरे बोला —

— मेरे तो पड़पोते होंगे।

तांग सान्ज़ांग ने उसे आँख से चेतावनी दी।

रत्न-जड़ित प्यालों में सुगंधित चाय आई। बातें हुईं — फिर बूढ़े ने पूछा —

— क्या आपके पास कोई दुर्लभ वस्तु है? हम भी देखें।

सुन वुकोंग ने कहा —

— गुरुजी की काश्यप है — एक शानदार वस्तु है।

भिक्षुओं ने ठंडी हँसी दी —

— काश्यप? हमारे पास तीस-चालीस हैं। हमारे बुज़ुर्ग ने दो सौ साठ साल में सात-आठ सौ जमा किए हैं। आइए देखें।

उन्होंने बारह संदूक निकाले, काश्याएँ पंक्ति में टाँग दीं — कढ़ाई, ज़री, सोने का काम — सब शानदार था।

सुन वुकोंग ने ऊपर से नीचे देखा।

— ठीक हैं। हमारी भी निकालिए।

तांग सान्ज़ांग ने उसे खींचकर धीरे कहा —

— घमंड मत करो। बाहर के लोगों के साथ संपत्ति की होड़ मत लगाओ। लालची आदमी देखेगा तो नुक़सान होगा।

— आप आराम से बैठिए — सब मेरे ज़िम्मे।

सुन वुकोंग ने झोला खोला — लाल प्रकाश कमरे में भर गया, रंगीन आभा चारों ओर।

भिक्षुओं ने देखा और मन-ही-मन ललचाए। बूढ़े के पास गए, घुटने टेके, आँखें नम हो गईं —

— मैं बिना क़िस्मत का हूँ। इतनी अच्छी काश्यप नहीं देख पाया — रोशनी में।

— इसे एक रात के लिए ले जाने दें — सुबह वापस करूँगा।

तांग सान्ज़ांग घबराए — सुन वुकोंग को डाँटा। लेकिन सुन वुकोंग ने काश्यप दे दी।

— रात भर में क्या होगा?


रात हुई। बूढ़ा पिछले कमरे में काश्यप देखकर रोने लगा।

एक शिष्य ने कारण पूछा। बूढ़ा बोला —

— मुझे अपने जीते जी यह एक दिन भी पहनना नहीं मिलेगा।

— तो उन्हें एक दिन रुकने दीजिए, पहनने दीजिए।

— वे चले जाएंगे तो?

एक शिष्य "गुआंगझी" बोला —

— इसका हल आसान है। सब लोग मिलकर जाओ — भाले, तलवारें, आग लेकर। उन दोनों को जला दो, काश्यप हमारी।

बूढ़ा ख़ुश हुआ। तैयारी शुरू हुई।

एक दूसरे शिष्य "गुआंगमोउ" ने कहा —

— रुको। वह सफ़ेद-मुँह वाला भिक्षु तो आसान है — लेकिन वह बंदर-मुँह वाला? अगर मार नहीं पाए तो?

बूढ़ा —

— तो क्या करें?

— हथियार नहीं चाहिए। सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी करो — उनके कमरे के चारों ओर रख दो — और आग लगा दो। कोई कहे तो कहेंगे — ख़ुद उनसे आग लगी।

सबने तालियाँ बजाईं। लकड़ियाँ जमा होने लगीं।


सुन वुकोंग भले ही सोया था — पर उसकी आत्मा जागती थी। लोगों के क़दमों की आवाज़, लकड़ियों का खुरदुरापन। उसने समझ लिया।

उठा — कमरे का दरवाज़ा न खोला। एक शहद-मक्खी बन गया।

बाहर आकर देखा — भिक्षु लकड़ियाँ रख रहे थे, आग लगाने की तैयारी हो रही थी।

"इन्हें मारूँगा तो गुरुजी नाराज़ होंगे। इनकी चाल को चाल से काटता हूँ।"

वह उड़ा — सीधे दक्षिण-स्वर्ग-द्वार पर। रक्षक देवता घबराए —

— अरे, वह उत्पाती फिर आया!

सुन वुकोंग ने कहा —

— "आकाश-दृष्टि देव" से मिलना है।

— क्यों?

— तांग सान्ज़ांग पर ख़तरा है — आग से। "आग-रक्षक छत्र" उधार चाहिए।

— आग से बचाने के लिए पानी उधार लो — छत्र क्यों?

— पानी से आग बुझाऊँ तो उनकी चाल काम करेगी — छत्र से केवल हमारे कमरे को बचाना है। बाकी आग — जलती रहे।

— यह बंदर हमेशा कुछ उल्टा सोचता है — देव हँसे।

लेकिन उन्होंने छत्र दे दिया। सुन वुकोंग तेज़ी से उतरा — कमरे की छत पर छत्र रख दिया — और कमरे में गुरु के पास बैठ गया।

अब उसने दक्षिण की हवा खींची और फूँक दी।

आग भड़की।

काली धुंध चारों ओर, लाल लपटें आसमान छूने लगीं। पहले सोने की साँप की तरह, फिर ख़ूनी घोड़े की तरह। दक्षिण की शक्ति ने ज़ोर लगाया, अग्नि-देव ने बल लगाया। सूखी लकड़ियाँ जलने को तैयार, तेल के दरवाज़े पर रंगीन लपटें। मठ की बुद्ध-प्रतिमाएँ जल गईं, पूर्व का देवालय राख में मिला। लाल-क़िले की रात की लड़ाई-सी, अफ़ारसियस के महल की आग-सी।

रात भर आग जलती रही। भोर में बुझी। भिक्षु राख में ताँबा-लोहा ढूँढ रहे थे, दीवारों की आड़ में खाना पका रहे थे।

सुन वुकोंग छत्र लौटाने ऊपर गया —

— शुक्रिया। "अच्छा उधार ले, अच्छा लौटा — फिर माँगो तो न मिले।"

देव हँसे —

— यह उत्पाती वाक़ई कुछ नहीं बदला।

सुन वुकोंग मक्खी बनकर कमरे में लौटा, असली रूप में आया।

— गुरुजी, सुबह हो गई। चलें।

तांग सान्ज़ांग उठे, दरवाज़ा खोला — और सब राख देखकर चौंक गए —

— रात को आग लगी? मुझे नींद में कुछ नहीं पता चला!

— मैंने आपको जगाया नहीं।

— तुमने दूसरे कमरे नहीं बचाए?

सुन वुकोंग ने समझाया — उन्होंने ही आग लगाई थी।


पीछे के कमरे में बूढ़ा भिक्षु काश्यप ढूँढ रहा था — लेकिन वह थी ही नहीं।

भिक्षु ने सोचा — काश्यप भी जल गई। लेकिन तांग सान्ज़ांग भी जीवित! निराश, लज्जित, उसने दीवार में सिर दे मारा।

मर गया।

तांग सान्ज़ांग के पास भिक्षु आए —

— गुरुजी, काश्यप किसने चुराई?

सुन वुकोंग ने पूछा —

— क्या यहाँ आसपास कोई राक्षस है?

— पूरब में बीस ली दूर — कृष्ण-पवन पर्वत पर एक कृष्ण-पवन महाराज रहता है। वह हमारे बूढ़े गुरु का मित्र था।

— बस वही होगा! — सुन वुकोंग बोला।

वह उड़ा — पर्वत की ओर।

बौद्ध-गुरु पश्चिम को निकले, वे आगे बढ़े, राक्षस-दैत्यों से गुज़रे। रात की आग ने मठ जलाया, कृष्ण भालू ने रात को काश्यप चुराई।